Sunday, November 24, 2019

काला मन और रस्ता सुनसान, उसमें छिपा है एक शैतान।

काला मन और रस्ता सुनसान,
उसमें छिपा है एक शैतान,
अपनी बहन का चीर उतारे,
समझे महिला वस्तु के समान,
करता दुष्कर्म भय न लगता,
लगता इंसान है बना हैवान,
बस हवस की आग में डूबा,
हरता गया स्त्री का मान।

काला मन और रस्ता सुनसान,
उसमें छिपा है एक शैतान,
जाना मैंने तो खून ये खोला,
सोचा ले लूं मैं सबकी जान,
सोचा खत्म हो जाए दुनिया,
अगर न खत्म कर पाऊं दुख इसमें विधमान,
मानव का फिर अर्थ ही क्या,
जब इसमें शामिल ना स्त्री का मान।

काला मन और रस्ता सुनसान,
उसमें छिपा है एक शैतान,
सोचा आरक्षी का द्वार पढ़ु में,
थोड़ा दोस उस पर भी मड़ु मैं,
कहुँ कि अपना फर्ज निभाये,
मेरी बेहना को न्याय दिलाएं,
शैतानों को पकड़ ले आए,
कल का सूरज न वह देख पाए।

काला मन और रस्ता सुनसान,
उसमें छिपा है एक शैतान,
पाया दोषी हम उम्र थे मेरे,
उनकी काठी भी छात्र समान,
खड़े माँ-बाप उनके पीछे भी,
उनके दुष्कर्म पर आंख मिचे से,
सोचा क्या शैतान मेरे भी अंदर,
अगर है तो इसी छन चले जाएं मेरे भी प्राण।

काला मन और रस्ता सुनसान,
उसमें छिपा है एक शैतान,
चलो हम एक ऐसी दुनिया बनाएं,
स्त्री के मान पर कोई आँच न आ पाए,
किसी बहन का लाज न लुटे,
ले ले हाथों में मर्यादा की कमान,
सब में शील का वृक्ष उगाएं,
व्यक्ति को बनाएं राम समान।

काला मन और रस्ता सुनसान,
उसमें छिपा है एक शैतान।

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